मलेश्वर महादेव मंदिर शिव पार्वती के मंदिर । Maleshwar Mahadev Mandir Himanchal pardesh.
हिमालय देव भूमि कहा जाता है यह देवभूमि मंदिरों की नगरी है हर कोने पर देवी देवताओं के मंदिर स्थापित है इन्हीं मंदिरों में एक मंदिर ऐसा भी है जो वहां घटित होने वाले चमत्कार के कारण और महाभारत के परमाणु के कारण आकर्षण का केंद्र बन गया है, मंदिर है मलेश्वर महादेव मंदिर शिव पार्वती के मंदिर के अग्निकुंड की जाला 5000 वर्षों से अनवरत चल रही है इतने वर्षों से झलक रही है यह कोई नहीं जानता लोग इसे चमत्कार मानते हैं और इस चमत्कार का साक्षी बनने दूर-दूर से यहां तो आखिर क्यों चल रही है ममलेश्वर महादेव मंदिर के कुंड की अग्नि के पीछे का रहस्य कहां से जुड़े हैं इसके तार और आखिर क्या है महाभारत का संबंध चलिए जानते हैं,
Mahabharat kaal ke bheem ka dhol. भीम का ढोल
नागु सत्य प्रमाणित करते हैं ईश्वर महादेव मंदिर हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले की तहसील करतूत के मेल गांव में स्थित है इसकी दूरी 108 किलोमीटर है मंडी से इसकी दूरी 125 किलोमीटर है इनके बारे में कहा जाता है कि यह ऋषि की तपोस्थली थी इसके उपरांत कराते हुए परिवर्तनों के फल स्वरुप को वहां से विस्थापित होना पड़ा किन्नर कन्या से विवाह कर लिया उस किन्नर कन्या के नाम से ही स्थान का नाम ममाता मेल पड़ा और ममता की दो पुत्रियां और विमला नदियों के रूप में प्रवाहित होकर पूरे क्षेत्र को सूचित करते हैं इन दोनों नदियों के कारण ही कर दो गांव की भूमि उपजाऊ बनी और पार्वती को समर्पित है गूगल रूप में स्थापित हैं मंदिर का मुख्य भवन लकड़ी से निर्मित है जिन पर उत्कृष्ट नक्काशी की गई है देवी देवताओं के अतिरिक्त इन पर कई अन्य मूर्तियां भी उकेरी गई है मंदिर के प्रवेश द्वार पर भी शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित की गई है मलेश्वर महादेव मंदिर महाभारत काल से जुड़ा हुआ है अपने अज्ञातवास के दौरान पांचों पांडवों ने कुछ समय के लिए निवास किया था जिसके प्रमाण में कैसा आज भी मंदिर में मौजूद है इस मंदिर में एक प्राचीन ढोल भी रखा हुआ है कहा जाता है कि यह ढोल 5000 वर्ष पुराना भीम का ढोल है बेल की लकड़ी से निर्मित यह आकार गोलाकार है,
महाभारत काल का गेहूं का दाना। Mahabharat kaal ka gehu ka Dana.
इसके अलावा यहां पांडवों के समय का एक गेहूं का दाना भी सुरक्षित रखा गया है कि विशेष बात यह है कि यह सामान्य गेहूं के दाने से 2000 गुना बड़ा है और इसका वजन करीब 200 ग्राम है यहां आम के बराबर है लकड़ी के डिब्बे में बंद करके रखा गया है जिस पर पारदर्शी यह सुरक्षित लोग मंदिर के पुजारी से निवेदन कर सकते हैं अन्य पांडवों द्वारा स्थापित किए गए थे जो आज भी देखे जा सकते हैं इसके अतिरिक्त एक मान्यता यह भी है कि भगवान ने घाटी में शिवलिंग की स्थापना की थी अग्निकुंड अग्नि कुंड की अग्नि पिछले 5000 वर्षों से चल रही है
महाभारत कालीन अग्निकुंड। Mahabharat kalin agnikunda.
आश्चर्य की बात यह है कि इन अग्निकुंड की राख वर्षों से उतनी की उतनी है ना तो यहां बढ़ती है और ना ही कम होती है वैज्ञानिक भी अग्नि कुंड की अग्नि के रहस्य से पर्दा उठाने में असफल रहे हैं लोग इसे चमत्कार मानते हैं और इसकी पूजा करते हैं अग्निकुंड की राख पवित्र मानी जाती है लोग दर्शन के उपरांत शव को अपने मस्तक पर लगाते हैं और अपने साथ ले जाते हैं उसी के अनुसार जब पांडव अज्ञातवास के समय कुछ दिनों के लिए इस गांव में ठहरे थे,
बकासुर राक्षस वध की कहानी। Vakasur ka vadh.
तब बकासुर नामक राक्षस ने गांव के लोगों को आतंकित कर रखा था गांव के पास ही गुफा में निवास करता था कई एक साथ पूरे गांव के लोगों को मौत के घाट उतार देते गांव वालों ने उसके साथ एक समझौता किया समझौते के अनुसार गांव वालों के भोजन के लिए उसके पास भेजना था जहां अतिथि के रुप में थे बकासुर और भीम में भयंकर युद्ध हुआ जिसमें भीम ने बकासुर का वध कर उस गांव को उसके आतंक से मुक्ति प्रदान की टीम के विजय के उल्लास में क्या अग्निकुंड में अग्नि प्रज्वलित की गई दो तब से लेकर आज तक चल रही है ममलेश्वर महादेव मंदिर के पास एक विशाल मंदिर लोगों की माने तो प्राचीन काल में इस मंदिर में बूढ़ा यज्ञ किया जाता था और यदि के दौरान नर बलि दी जाती थी उस काल में पुजारी गढ़ी मंदिर में प्रवेश कर सकते थे वर्षों से बंद पड़ा है यदि मंदिर में जाना हो तो प्राचीन काल की तरह पुजारी मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं शिमला और मंडी पहुंचकर बस स्वयं की कार से दर्शन के लिए पहुंचा जा सकता है कि मित्रों आशा करते हैं कि यह वीडियो आपको पसंद आया होगा तो वीडियो पसंद आए तो इस वीडियो को लाइक करें और अपने दोस्तों के साथ भी शेयर करें।
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प्रथम सर्ग 78 से 117,
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