ads

गृहस्थ जीवन क्या है - गृहस्थ आश्रम के नियम क्या है - grihastha ashram rules

गृहस्थ जीवन क्या है - गृहस्थ आश्रम के नियम क्या है - grihastha ashram rules


अपने पूर्व जन्मके अच्छे कर्मों के फलस्वरूप हमको यह मानव शरीर प्रान होता है और इसी मानव शरीर को ईशरचित इस असार संसार में उसके ज्ञान द्वारा सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इस मानव शरीर को विशेषता को जानकर ही देवता भी इस भारतखंड में प्राणीमात्र को सेवा करने के लिये मनुष्य शरीरमें जन्म लेनेको सदाही इच्छुक रहते हैं।


grihastha-ashram-rules



अतः परम पिता परमात्मा को हर समय ध्यानमें रखते हुए सत्धुद्धि की प्रापि कर ईश्वरीय प्राकृतिक नियमानुसार चलकर ज्ञान सहित सत्कर्म करते हुए आत्माका प्रकाश बढ़ाते हुए मोक्ष को प्राप्ति करे इसी में मानव जीवन की सफलता है।

गृह्सत सब आश्रमों में श्रेष्ठ माना गया है। ब्रह्मचर्याश्रमके विधि पूर्वक पालन करनेके पश्चात् गृहस्थाश्रममें प्रवेश करना चाहिये क्योंकि उस समय तक हमारी बुद्धि परिपक्व हो जाती है। हमारा शरीर बलवान् वीर्यवान् और आरोग्य रहता है। हमारा मन शुद्ध और सत्कार्यों की ओर मुका हुआ होता है। सब आश्रमोंके लोग गृहस्थाश्चममें आकर ही आभय पाते हैं। अन्य तीनों आश्रमवालोंके पालनपोषण का भार गृहस्थोंके कन्धों पर ही होता है। कमजोर कन्धे इस भार को कैसे सम्हाल सकते हैं। 

गृहस्थ आश्रम का महत्व - ग्रस्त आश्रम क्या है? - grihastha ashram rules


शास्त्र कहते है फिधुपलेन्द्रिय टी स्पुरप इस आयम के प्यार नहीं कर सकते। अतएव गृहस्थाश्रम को चलानेके लिए आवश्यक है कि स्त्रीपुरुप अपने शरीर और मन को खूब यलवान बनावें। सांसारिक व्यवहारों को उत्तम रीतिसे चलाने की सामर्थ्य और विद्यावल प्राप्त करें। तभी शूरवीर और बुद्धिमान सन्तान पैदा होगी एवं गृहस्थाश्रम का योम सम्हालकर अन्य आश्रमों की सेवा की जा सकेगी। इस आश्रम में आफर मनुष्य सत्कर्म करता हुआ मोक्ष प्राप्त कर सकता है।  त्रीपुरुष का जो वैवाहिक बन्धन है उसीका नाम गृहस्थाश्रम है और उन दोनोंके एक होकर रहनेसे ही गृहस्थ का काम सुचारु रूपसे संचालित होता रहता है। गृहस्थाश्रममें स्त्रीपुरुष को कामवासना रहित प्रेम भावसे रहकर  ज्ञान सहित सन्तानोत्पत्ति करनी चाहिये। वह गृह स्वोपम है जिसमें स्त्रीपुरुष एक दूसरेसे प्रेमयुक्त व्यवहार करते हों तथा दोनों ईश्वरीय प्राकृतिक नियमानुसार अपने कर्त्तव्यका पालन करते हों। 


स्त्री पुरुप का आधा अङ्ग मानी गई है अतः वह पूर्ण अङ्ग वैवाहिक बंधनसे ही बनता है और वैवाहिक बन्धनके बाद भी दोनों की प्रकृतिका अनुकूल होना अत्यावश्यक है। दोनों को प्रकृति मिलनेसे उनमें प्रेमभाव की मात्रा बढ़ेगी और आपसके प्रेमसे उस घरके सब कार्य सुचारु रूपसे सम्पन्न होते रहेंगे तथा वह घर स्वर्गतुल्य अन जायगा। स्त्री पर ही घर का सब भार आश्रित है। स्त्री के ही अच्छे कमांसे चह घर सुखी रहता है। घरके समस्त कार्योंकी देखरेख तथा संतान का लालनपालन सब स्त्री पर निर्भर करता है 


गृहस्थ आश्रम के नियम क्या है


अत इस गृहस्थाश्रमके कार्यों को सुचारु रूपसे संचालित करनेके लिये स्त्री को शिक्षिता सदा चारिणी गुणशालिनी एवं गृह कार्य में प्रवीण होना अत्यावश्यक है। साथ ही पुरुष को भी अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए स्त्री को उसके गृहकार्यमें वरावर सहायता पहुंचाते रहना चाहिये। दोनोंके प्रेमयुक्त सम्पर्फसे ही उस घर का काम ठोकसे चल सकता है। गृहस्थाश्रममें प्रवेश करने के पश्चात् त्रीपुरुष को सपर्ममें रत रहते हुए एक दूसरे का रक्षक होकर रहना चाहिये नकि इन्द्रियोंके क्षणिक सुखके वशीभूत होकर एक दूसरे का भक्षक वनं आय । इस समय हमको ज्ञानसहित अपनी शक्ति को पर्याप्त रूपमें संचित करते हुए अपनी आत्मा एवं उसके प्रकाश को धढ़ाते हुए एवं पुरुपायके साथ प्राणीमात्र की निःस्वार्थ भावसे सेवा करते हुए अपने गार्हस्थ्यजीवन को सुचारु रूपसे संचालित करते रहना चाहिये। इसीमें मानव जीवन का कल्याण है।

हिरण्यक शिपु वंश प्रम्परा का वर्णन
4 vedo 18 Purano sahit 14 Vidhyavo Ka Vibhajan
16 हिन्दू संस्कार की सम्पूर्ण शास्त्रीय विधि
विज्ञान परिचय
भारतीय इतिहास की प्राचीन वंशावली
श्री कल्किपुराण अध्याय १५ 


Post a Comment

0 Comments